राजनीति संवाददाता। शिखर संवाद
Bisauli Vidhansabha Seat : उत्तर प्रदेश की सियासत में बदायूं जिला हमेशा से सत्ता की धुरी रहा है, और इसमें भी बिसौली विधानसभा 112 का मिजाज सबसे जुदा है। 1957 में वजूद में आई यह सुरक्षित सीट आज एक अजीबोगरीब सियासी चौराहे पर खड़ी है। वर्तमान विधायक आशुतोष मौर्य, जिन्होंने समाजवादी पार्टी के साइकिल पर सवार होकर जीत दर्ज की थी, अब भगवा रंग में रंगे नजर आ रहे हैं। राज्यसभा चुनाव में क्रॉस वोटिंग के बाद से ही उनके सुर बदल गए हैं। वहीं दूसरी ओर, पूर्व विधायक कुशाग्र सागर अपनी पिछली हार का हिसाब चुकता करने के लिए जमीन आसमान एक कर रहे हैं। मुकाबला अब केवल विपक्ष से नहीं, बल्कि घर के भीतर टिकट की दावेदारी को लेकर है, जिसने बिसौली की फिजाओं में सियासी सरगर्मी को चरम पर पहुंचा दिया है।
बिसौली का इतिहास गवाह है कि यहां व्यक्ति से ज्यादा परिवार का रसूख बोलता है। विधायक आशुतोष मौर्य का परिवार विधानसभा के गठन के समय से ही राजनीति की मुख्यधारा में है। उनकी बहन मधु चंद्रा जिला पंचायत अध्यक्ष रह चुकी हैं। आशुतोष भले ही तकनीकी रूप से अभी सपा विधायक हैं, लेकिन उनका दिल और रणनीति भाजपा के पाले में जा चुकी है। चर्चा है कि वह अपने परिवार को भाजपा में सेट कर चुके हैं और अब खुद की सदस्यता महज एक औपचारिक कदम है।
दूसरी तरफ, भाजपा के युवा चेहरा कुशाग्र सागर हैं, जो 2022 के चुनाव में 1834 वोट के मामूली अंतर से मात खा गए थे। विश्लेषकों का मानना है कि पिछली बार जनता से दूरी उन्हें भारी पड़ी थी, लेकिन इस बार कुशाग्र ने उस गलती से सबक ले लिया है। वह जी-तोड़ मेहनत कर रहे हैं और जनसंपर्क के मामले में किसी से पीछे नहीं हैं। कुशाग्र की जड़ें भी गहरी हैं, उनके पिता योगेंद्र सागर प्रदेश सरकार में मंत्री रहे हैं और मां प्रीति सागर जिला पंचायत अध्यक्ष की कुर्सी संभाल चुकी हैं।
बिसौली में भाजपा के भीतर अब दो स्पष्ट गुट उभर आए हैं। सूत्रों की मानें तो बिसौली गुट आशुतोष मौर्य की पैरवी कर रहा है, उन्हें अनुभवी और जिताऊ चेहरा मान रहा है। वहीं जिला स्तर के नेता कुशाग्र सागर के लिए फील्डिंग सजा रहे हैं, ताकि उनकी निष्ठा और युवा छवि का लाभ मिल सके। प्रस्तावित गंगा एक्सप्रेस-वे के किनारे बसी इस विधानसभा में विकास और विरासत की इस जंग में पार्टी किसे अपना सिपाही बनाएगी, यह देखना दिलचस्प होगा। आगामी चुनाव न केवल एक सीट का फैसला करेगा, बल्कि यह भी तय करेगा कि बिसौली के सिंहासन पर किस राजनीतिक खानदान का कब्जा बरकरार रहेगा। पार्टी एक है और दावेदार दो कद्दावर, साफ़ है कि बिसौली के इस महाभारत में किसी एक को सब्र का घूंट पीना ही पड़ेगा।

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